दिल्ली विश्वविद्यालय इन दिनों "गुंडों" और "गुंडागर्दी" का अड्डा बना हुआ है....

दिल्ली विश्वविद्यालय इन दिनों ''गुंडों'' और ''गुंडागर्दी'' का अड्डा बना हुआ है  ....
---------------------------------------------------------------------------------------------


                      घटना परसों (04/09/18) की है। आर्ट्स फैक्ल्टी भवन के हिंदी विभाग वाली गली (जिसके ठीक सामने पुराना कनवोकेशन हॉल है) में चंद क्षणों के लिए एक सीनियर भैया से हाथ मिलाने के लिए ठहरा ही था कि इतने में सामने से आ रहे 7-8 लड़कों के एक समूह ने मुझ पर हमला बोल दिया।  दरअसल हुआ यूँ कि जब मैं सीनियर भैया से हाथ मिला रहा था तभी वे लड़के मेरे सामने से गुजरे और उनमें से एक लड़का थोड़ा बगलकर निकलने की बजाये जानबूझकर मुझे धकेलते हुए अकड़पन में निकल गया।मैंने सिर्फ इतना कहा था कि-
"देख के चल लो भाई''
बात बस इतनी ही थी कि उसके साथ के दूसरे लड़के मुझसे हाथापाई पर उतर आये।  
''तन्ने बोल्या कैसे??''
"तू जाणे है मन्ने??"

                                                मुझे चारों तरफ से घेर लिया गया और बुरी तरह धक्का-मुक्की करते हुए मेरी गर्दन और कॉलर तक पहुँच गए। मैं भौंचक्का था कि आखिर मैंने ऐसा क्या कह दिया या कर दिया। इतने में अगल-बगल और लोगों को देख विवाद बढ़ने की डर से उनमें से कुछेक एक-दूसरे को छुड़ाया और तेजी से चलते बने। हिंदी विभाग के सामने से होते हुए वे डूसू ऑफिस की तरफ मुड़ गए। और मैं स्तब्ध देखता रहा।मैं इन्हें 'गुंडे' इसलिए कह रहा हूँ कि मेरा भी दिल्ली विश्वविद्यालय से पिछले 6-7 वर्षों का रिश्ता रहा है, कोई भी आम छात्र पहले तो इस तरीके से धक्का नहीं मारेगा और अगर गलती से लग भी गया तो सॉरी तुरंत बोलेगा। कई बार तो यह भी देखने को मिलता है कि गलती न होने के बाद भी पहले सॉरी बोलने की होड़ लग जाती है और अगला बंदा पहले सॉरी बोल देता है।
         
                     कहना ये है कि ये घटना बेशक मेरे साथ पहली बार हुई हो पर ये घटनाएँ यहाँ आम हैं, खासतौर से इन दिनों डूसू चुनाव के दौरान। इससे भी बद्दतर घटनाओं की न जाने कितनी ही रपटें मॉरिश नगर थाने में दर्ज़ हैं, पर होता है क्या? इनमें दो रे नहीं कि विभिन्न राजनितिक पार्टियों से जुड़े ये लोग छात्र तो कहीं से भी नहीं होते।  खुला कैम्पस होने के कारण ये लोग 1000-500 रूपये और एक-एक बीयर की बोतल पर दिन-दिन भर हुड़दंग करने, मारपीट करने और कम्पेन करके डूसू चुनाव को "सफल" बनाने के लिए इन्हें दिल्ली-एनसीआर से बुलाया जाता है। पुलिस की चाक-चौबंदी के बावजूद राजनितिक-प्रश्रय प्राप्त होने के कारण ये लोग सरेआम दहशतगर्दी करते चलते हैं।  पुलिस पकड़ भी लेती है तो ज्यादा से जयदा घंटे भर में ऊपर से फोन आते छूट जाते हैं।
                                           ऐसे में देश के इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में आम छात्रों की सुरक्षा, यहाँ हो रही छात्र-राजनीति की दशा-दिशा आदि सभी कुछ पर्याप्त चिंता के विषय हैं।

Comments