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दिल्ली विश्वविद्यालय इन दिनों "गुंडों" और "गुंडागर्दी" का अड्डा बना हुआ है....

दिल्ली विश्वविद्यालय इन दिनों ''गुंडों'' और ''गुंडागर्दी'' का अड्डा बना हुआ है  .... ---------------------------------------------------------------------------------------------                       घटना परसों (04/09/18) की है। आर्ट्स फैक्ल्टी भवन के हिंदी विभाग वाली गली (जिसके ठीक सामने पुराना कनवोकेशन हॉल है) में चंद क्षणों के लिए एक सीनियर भैया से हाथ मिलाने के लिए ठहरा ही था कि इतने में सामने से आ रहे 7-8 लड़कों के एक समूह ने मुझ पर हमला बोल दिया।  दरअसल हुआ यूँ कि जब मैं सीनियर भैया से हाथ मिला रहा था तभी वे लड़के मेरे सामने से गुजरे और उनमें से एक लड़का थोड़ा बगलकर निकलने की बजाये जानबूझकर मुझे धकेलते हुए अकड़पन में निकल गया।मैंने सिर्फ इतना कहा था कि- "देख के चल लो भाई'' बात बस इतनी ही थी कि उसके साथ के दूसरे लड़के मुझसे हाथापाई पर उतर आये।   ''तन्ने बोल्या कैसे??'' "तू जाणे है मन्ने??"                               ...

कुछ तो है तेरे मेरे दरमियाँ.."-कविता

कुछ तो है तेरे मेरे दरमियाँ... .............................. कुछ तो है तेरे मेरे दरमियाँ.. तू मुझे वहाँ दुआएँ देती है, और मुझे यहाँ नेमतें मिलती हैं। कुछ तो है... तू वहाँ उदास होती है, मन मेरा यहाँ उचटता है। तू वहाँ पे साँसें भरती है, दिल मेरा यहाँ धड़कता है।     कुछ तो है तेरे मेरे दरमियाँ,     तू मुझे वहाँ दुआएँ देती है,     और मुझे यहाँ नेमतें मिलती हैं, कुछ तो है... तू वहाँ पे कलियाँ बोती है, मुझे यहाँ बगीचे मिलते हैं। तू वहाँ दीये जलाती है, मुझे यहाँ रौशनी मिलती है।     कुछ तो है तेरे मेरे दरमियाँ...     तू मुझे वहाँ दुआएँ देती है,     और मुझे यहाँ नेमतें मिलती हैं.. कुछ तो है... तू मुझे वहाँ याद करती है, मैं यहाँ हिचकियाँ लेता हूँ। तू वहाँ आँखें भिगोती है, मैं यहाँ सिसकियाँ लेता हूँ।     कुछ तो है तेरे मेरे दरमियाँ...     तू मुझे वहाँ दुआएँ देती है,     और मुझे यहाँ नेमतें मिलती हैं.. कुछ तो है... तू वहाँ मुस्काया करती है, मैं यहाँ खिलखिलाने लगता हूँ।...