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Showing posts from 2017

गुजरात और 'नोटा'-लेख

                     गुजरात और 'नोटा'           गुजरात के जनादेश के कांग्रेस-बीजेपी जो भी मायने निकालते हों, निकालें। जिस भी दृष्टि से अपनी पीठ थपथपाना चाहते हों, थपथपालें! वे इसके लिए स्वतन्त्र हैं। पर इस जनादेश का एक पक्ष ऐसा भी है जिस पर इनका ध्यान नहीं जा रहा है! और जाये भी तो क्यों?? और वो है 'नोटा' (NOTA-None Of  The Above) को मिले तकरीबन साढ़े पाँच लाख से अधिक वोट का । दरअसल NOTA विकल्प के अंतर्गत मतदाताओं को किसी भी उम्मीदवार को नापसन्द करने का अधिकार दिया गया है। इस विकल्प की व्यवस्था के लिए जनहित याचिकाओं के दबाव में सर्वप्रथम भारतीय निर्वाचन आयोग ने ही 2001 में सर्वोच्च न्यायालय में अपील की थी। जिस पर संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक लम्बी कालावधि के बाद 27 सितम्बर 2013 को EVM (Electronic Voting Machine) में NOTA विकल्प को स्थापित करने के आदेश दिए थे। जिसका प्रयोग सर्वप्रथम 2014 के लोकसभा चुनाव में हुआ ।              अब लौटते हैं अपने मूल विषय पर। ...

माननीय मुख्यमंत्री योगी जी के नाम खुला-पत्र

माननीय मुख्यमंत्री(उत्तर प्रदेश) योगी आदित्यनाथ जी के नाम खुला पत्र- ------------------------------------------------- प्रिय योगी जी, प्रणाम !                                 सर्वप्रथम आपको मुख्यमंत्री बनने की हार्दिक बधाई। आशा करता हूँ कि आप प्रदेश की जनता की उम्मीदों पर खरा उतरेंगे और जैसा कि प्रदेश के सभी वर्गों का आपको साथ मिला है, उसे भी आप तठस्थ होकर निभाएंगे।                     प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में स्वच्छता का जो 'आंदोलन' और विकास की जो 'रीति' चली है,  उसे जनता का भी भरपूर साथ मिल रहा है, पर इसका फ़लक राजनैतिक और सामाजिक ही अधिक है। आधुनिकता की दौड़ में सुचिता और विकासशीलता का सांस्कृतिक पक्ष छूटता जा रहा है। हमें भौतिक विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक विकास पर भी ज़ोर देना हो...

ऐ मेरे मालिक...

ऐ मेरे मालिक.. -------- ऐ मेरे मालिक रुक तो जा जाना ही तो है, और जाना तो है ही चलता हूँ अभी थोड़ी देर थम तो जा। उठा लूँ चुन-चुनकर खुदको जरा उन रस्तों से, जहाँ उनके साथ कहीं-कहीं कभी-कभी मैं छूटा था, मना तो लूँ गिर-गिर के पैर पड़-पड़ के जरा उन यादों में उनको जहाँ कहीं-कहीं कभी-कभी वो रूठा था..!!

चन्द आईफोन वाले..-कविता

चन्द आईफोन वाले... ---------- उबड़ खाबड़ चेहरे और पतझड़ से शरीर वाला जर्जर से रिक्शे पर सवार वो जर्जर आदमी, पहाड़-सी चढ़ान पर लमर-लमर कर खींचता आईफोन वाले दो मोटे-मोटे लोगों को, गंदेले ढीले-ढाले जामे में पसलियों की टाट खरखराती, और उस पर चिपकीं उसकी नसें एंड़ी से चोटी तक लत्तरों-सी छितरायीं, कपार की लकीरें खिसककर दोनों भौहों के बाएँ-दाएँ धड़कतीं दूर से दिखतीं, लगता जैसे कोई साँसें ले रहा हो कैजुएलिटी में। वो सदियों से और उसका ये जीवन सदियों-सा, और उस जैसे अनन्त जुते हुए हैं सदियों से, अनन्त उन पहियों में जिन पर सवार हैं चन्द आईफोन वाले ।।

पचस रोपेयहिया चप्पलें...-कविता

"पचस रोपेयहिया चप्पलें" -------------- तलवे की उभरी हड्डियों से ऊपरी हिस्से में बने छोटे छोटे गड्ढे तकरीबन तीन-चार, एंड़ी पर पड़ने वाले अत्यधिक भार से खियाया उसका निचला छोर एक बड़े आधे-खुले गड्ढे-सा, अंगूठे की जगह नली चिरी और जमीन की ओर बहती, टूटने और टँकवाने के बाद दस रोपेयहिया फीता धराया, और प्रदर्शन के दौरान रगेदे जाने पर छूटा- वो, और उस जैसे सैकड़ों और लाखों उन्हीं जैसे गड्ढों वाले चेहरों के प्रतिनिधि के रूप में, भीगीं-कुचलीं टूटी-बिखरीं अपने धारकों के भाग जाने के बाद भी उनके और उनके हालातों को बयाँ करतीं, दबी-सम्पीड़ित आवाज़ में अब भी नारे लगातीं, झकोर रही थीं तन-मन सब, पार्लियामेंट-स्ट्रीट पर पड़ीं- वो पचस रोपेयहिया चप्पलें।

वे ये नहीं जानते...-कविता

वे ये नहीँ जानते.. --------- उन्हें लगता है थम गया हूँ ऐसे जैसे जम गया होऊँ खिसकता तक नहीँ, वक्त के साथ पेंच और और भी पेंच कसते जा रहे हैं मुझमेँ, कमीज़ में बटन की तरह टाँक दिया गया हूँ ताकि हिल न सकूँ चल न सकूँ बोल न सकूँ, उन्हें गति स्वीकार नहीँ वो ठहरे रहते हैं और ठहरे ही रहना चाहते हैं वे डरते हैं गति से, पर वो नहीं जानते वो मुझे थाम नहीँ सकते रोक नहीँ सकते बाँध बनाकर, क्योंकि मैं विचारों से चलता हूँ, भागता हूँ और उड़ता हूँ शरीर से नहीं, वो शरीर को बाँध मेरे विचारों को और भी गतिशील बना जाते हैं वे ये नहीँ जानते।।

"वो जाती नहीं हैं..."-गीत

"वो जाती नहीं हैं....." ------------- वो जाती नहीं हैं,खयालों से मेरे। जवाबों से मेरे, सवालों से मेरे। उन्हें सोचता हूँ, उन्हें चाहता हूँ, वो रहती यहीं हैं उन्हें देखता हूँ.. उन्हें वास्ता है.. अंधेरों से मेरे, उजालों से मेरे.. वो जाती नहीं हैं, खयालों से मेरे.. छिटक सुबह जातीं, चमक जाती राहें, वो भर देतीं खुशियाँ उन्हें क्या सराहें... उन्हें वास्ता है.. अंधेरों से मेरे, उजालों से मेरे, वो जाती नहीं हैं, खयालों से मेरे.. जवाबों से मेरे,सवालों से मेरे.. वो जाती नहीं हैं, खयालों से मेरे।।।

कचरे के उसी ढेर से...-कविता

"कचरे के उसी ढेर से.." ------------ क्षण भर को जब भी गुजरते हैं वहां से सिकोड़ लेते हैं आप अपनी नाक-भौहें, घिना जाता है आपका मन चित्त, थूक पड़ते हैं फच से वहीँ पर, उमसा जाते हैं और भाग पड़ते हैं सिर पर पाँव रखकर। पर उनका क्या जिनके परिवार दशकों से धूप-छाँव सर्दी-गर्मी-बरसात हाथ-नाक-मुँह सब डालकर ढूँढते रहे हैं अपनी रोटियाँ भरते रहे हैं अपना पेट कचरे के उसी ढेर से।

"लॉक-तन्त्र"-लेख

               दिल्ली विश्वविद्यालय में होने वाले छात्र-संघ चुनावों  का मैं पिछले 5 वर्षों से प्रत्यक्षदर्शी रहा हूँ। पहली बात तो ये कि ये चुनाव किसी भी एंगल से "छात्र"-संघ चुनाव नहीं लगता क्योंकि इनमें भाग लेने वाले उम्मीदवार और इनके साथ कम्पेन करने वाले लोग "छात्र" तो लगते ही नहीं, एक नजर भर में भाँप जायेंगे ज़नाब। कैसे भी कर कराके डीयू के किसी भी कॉलेज में या विश्वविद्यालय के बुद्धिज़्म डिपार्टमेंट में कोटा-सोटा लगाके, जुगाड़-पानी भिड़ा के दाखिला पा जाते हैं ये। इन्हें पढ़ने लिखने से तो दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। करते हैं तो फुल टाइम 'पॉलटिक्स'।         दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिल होने का इनका पहला और आखिरी मकसद यही होता है 'नेता' बनना। टिकट से मतलब अधिक होता है, पार्टी से कम और विचारधारा तो ऐसे भी पल्ले नहीं पड़ती इनके।  मम्मी-पापा लोग भी भरपूर सपोर्ट करते हैं। बल्कि अधिकांश के तो चाचा,मामा,ताऊ तो खुद ही नेता होते हैं और वो उन्ही से प्रेरणा पाकर यहाँ आते हैं, 'नेता' बनने।विश्वविद्यालयी आचार-संहिता का सरेआम ह...