पचस रोपेयहिया चप्पलें...-कविता
"पचस रोपेयहिया चप्पलें"
--------------
तलवे की उभरी हड्डियों से
ऊपरी हिस्से में बने
छोटे छोटे गड्ढे
तकरीबन तीन-चार,
एंड़ी पर पड़ने वाले अत्यधिक भार से
खियाया उसका निचला छोर
एक बड़े आधे-खुले गड्ढे-सा,
अंगूठे की जगह नली चिरी
और जमीन की ओर बहती,
टूटने और टँकवाने के बाद
दस रोपेयहिया फीता धराया,
और प्रदर्शन के दौरान
रगेदे जाने पर छूटा-
वो,
और उस जैसे सैकड़ों और
लाखों उन्हीं जैसे गड्ढों वाले चेहरों के
प्रतिनिधि के रूप में,
भीगीं-कुचलीं टूटी-बिखरीं
अपने धारकों के भाग जाने के बाद भी
उनके और उनके हालातों को बयाँ करतीं,
दबी-सम्पीड़ित आवाज़ में
अब भी नारे लगातीं,
झकोर रही थीं तन-मन
सब,
पार्लियामेंट-स्ट्रीट पर पड़ीं-
वो पचस रोपेयहिया चप्पलें।
--------------
तलवे की उभरी हड्डियों से
ऊपरी हिस्से में बने
छोटे छोटे गड्ढे
तकरीबन तीन-चार,
एंड़ी पर पड़ने वाले अत्यधिक भार से
खियाया उसका निचला छोर
एक बड़े आधे-खुले गड्ढे-सा,
अंगूठे की जगह नली चिरी
और जमीन की ओर बहती,
टूटने और टँकवाने के बाद
दस रोपेयहिया फीता धराया,
और प्रदर्शन के दौरान
रगेदे जाने पर छूटा-
वो,
और उस जैसे सैकड़ों और
लाखों उन्हीं जैसे गड्ढों वाले चेहरों के
प्रतिनिधि के रूप में,
भीगीं-कुचलीं टूटी-बिखरीं
अपने धारकों के भाग जाने के बाद भी
उनके और उनके हालातों को बयाँ करतीं,
दबी-सम्पीड़ित आवाज़ में
अब भी नारे लगातीं,
झकोर रही थीं तन-मन
सब,
पार्लियामेंट-स्ट्रीट पर पड़ीं-
वो पचस रोपेयहिया चप्पलें।
Comments
Post a Comment