माननीय मुख्यमंत्री योगी जी के नाम खुला-पत्र

माननीय मुख्यमंत्री(उत्तर प्रदेश) योगी आदित्यनाथ जी के नाम खुला पत्र-
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प्रिय योगी जी, प्रणाम !
                                सर्वप्रथम आपको मुख्यमंत्री बनने की
हार्दिक बधाई। आशा करता हूँ कि आप प्रदेश की जनता की
उम्मीदों पर खरा उतरेंगे और जैसा कि प्रदेश के सभी वर्गों का
आपको साथ मिला है, उसे भी आप तठस्थ होकर निभाएंगे।
                    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में स्वच्छता
का जो 'आंदोलन' और विकास की जो 'रीति' चली है,  उसे जनता
का भी भरपूर साथ मिल रहा है, पर इसका फ़लक राजनैतिक और
सामाजिक ही अधिक है। आधुनिकता की दौड़ में सुचिता और
विकासशीलता का सांस्कृतिक पक्ष छूटता जा रहा है। हमें भौतिक
विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक विकास पर भी ज़ोर देना होगा।  
किसी भी देश की संस्कृति भाषा 'से' और भाषा 'में' निर्मित होती है,
जिसमें उस संस्कृति के धारक सोचते हैं,लिखते हैं,पढ़ते हैं,बोलते हैं
और करते हैं। ख़ासतौर से मातृभाषा में, जिसमें हमारे मानसिक विकास
की नींव पड़ती है और जिसमें किसी समाज का 'मानस' बनता है।
भारत में अनेक भाषाएँ, उपभाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। यही
उपभाषाएँ और बोलियाँ अधिकांश भारत की मातृभाषाएँ  हैं।  इस
प्रकार किसी भी देश का सांस्कृतिक विकास उसकी मातृभाषाओं
की स्थिति और उसके विकास की स्थिति पर टिक जाती है, जिससे
देश के कर्णधारों और दिशा-निर्देशकों का 'मानस' बनता है और उसका
'व्यक्तित्व' निर्मित होता है। ऐसे में 'स्वच्छ मानस' की निर्मिति के लिए
इन मातृभाषाओं की सुचिता आवश्यक हो जाती है, जिससे ना  सिर्फ हमारा
'लोक' बचा रहे बल्कि हमारा देश और राष्ट्र भी।
                     प्रश्न तो भारत की अन्य मातृभाषाओं की सुचिता का भी है।
 पर पूर्वांचली होने के कारण मेरा मेरी मातृभाषा-भोजपुरी से अतिरिक्त लगाव
का होना स्वाभाविक था और दूसरी ओर भोजपुरी को संविधान की आठवीं
अनुसूची में शामिल करने की मांग ने भी मुझे इस ओर सोचने को प्रेरित किया। इसमें
कोई दो राय नहीं कि भोजपुरी का क्षेत्र काफ़ी विस्तृत है और उसमें लोक-साहित्य
भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, जिससे हिंदी भी समय-समय पर अपना साहित्यिक
विस्तार करती रही है।  निश्चित ही इसे संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल किया
जाना चाहिए।  पर उससे पूर्व उसका भाषिक परिष्कार आवश्यक है।  मुख्य
रूप से भोजपुरी सिनेमा और उससे सम्बन्धित गीत-संगीत की भाषा का, जिसमें
बड़ी तेजी से अश्लीलता फैलती जा रही है। एक समय था जब 'नदिया के पार',
'बलमा बड़ा नादान', 'बिदेसिया', 'गंगा मैया तोहे पिअरी चढ़ैबो', 'कब होइ गवनवा
हमार', 'बन्धन टूटे ना' आदि फ़िल्में बनी थीं जिन्हें पूरे परिवार के साथ बैठ कर  देखा
जा सकता है, उनके गानें ना सिर्फ मर्यादित होते थे बल्कि उनमें नीति तत्व भी मिल जाया
करता था।  मैं अपने बचपन के दिनों में भरत  ब्यास, शारदा सिन्हा, मालिनी अवस्थी,
मनोज तिवारी आदि के गानों को सुना करता था और जाने-अनजाने घर-परिवार में भी
गुनगुना लिया करता था। परन्तु आज के भोजपुरी गानों को चार लोगों के बीच तो क्या
एक भद्र व्यक्ति उसे अकेले में भी सुनने में लज्जा महसूस करने लगता है।  ऐसा नहीं की
अच्छे गाने बनते ही नहीं या बनाये नहीं जाते पर अधिकांश गाने और यहाँ तक की पर्व-
तीज से सम्बन्धित गाने भी अश्लीलता की हद पार करते जा रहे हैं।
                      ज़ाहिर तौर पर भोजपुरी के 'लोक' का एक महत्वपूर्ण हिस्सा और
उसकी एक प्रभावशाली शाखा- भोजपुरी सिनेमा है, जो पिछले 10-15 वर्षों में
बड़ी तेजी से उभरी है और बहुतायत में भोजपुरिया समाज को प्रभावित भी करती है।  
इस अश्लीलता को परोसकर भोजपुरी सिनेमा का बाज़ार तो बढ़ता जा रहा है पर
उसका लौकिक स्तर गिरता जा रहा है।  वर्तमान में
और भावी पीढ़ी के लिए इसकी दशा और दिशा क्या होगी और क्या होनी चाहिए?
- फिलहाल दोनों ही चिंता का विषय हैं।  एक ओर तो हम नारी के सम्मान और
स्वाभिमान की इतनी बात करते हैं और वहीं दूसरी ओर 'स्त्री-देह' को ये सिनेमा
वाले लगातार विकृत से विकृत करते जा रहे हैं और हम उसका 'आनंद' ले रहे हैं ??
ये बहुत शर्म की बात है।  इस पर जल्द कुछ ठोस कदम उठाने की जरूरत है, कुछ
बड़े बदलाव की जरूरत है।  तभी भोजपुरी को उसका वास्तविक अधिकार मिल
पायेगा और हिंदी की बोली होने नाते हिंदी को उसका 'लोक' भी।  और तब कहीं
जाकर 'स्वच्छता' का संकल्प  वास्तव में पूरा माना जा सकेगा।    
                                                                                        


एक भावुक भाषा-प्रेमी

      -भूपेन्द्र 'भावुक'


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