गुजरात और 'नोटा'-लेख
गुजरात और 'नोटा'
गुजरात के जनादेश के कांग्रेस-बीजेपी जो भी मायने निकालते हों, निकालें। जिस भी दृष्टि से अपनी पीठ थपथपाना चाहते हों, थपथपालें! वे इसके लिए स्वतन्त्र हैं। पर इस जनादेश का एक पक्ष ऐसा भी है जिस पर इनका ध्यान नहीं जा रहा है! और जाये भी तो क्यों?? और वो है 'नोटा' (NOTA-None Of The Above) को मिले तकरीबन साढ़े पाँच लाख से अधिक वोट का । दरअसल NOTA विकल्प के अंतर्गत मतदाताओं को किसी भी उम्मीदवार को नापसन्द करने का अधिकार दिया गया है। इस विकल्प की व्यवस्था के लिए जनहित याचिकाओं के दबाव में सर्वप्रथम भारतीय निर्वाचन आयोग ने ही 2001 में सर्वोच्च न्यायालय में अपील की थी। जिस पर संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक लम्बी कालावधि के बाद 27 सितम्बर 2013 को EVM (Electronic Voting Machine) में NOTA विकल्प को स्थापित करने के आदेश दिए थे। जिसका प्रयोग सर्वप्रथम 2014 के लोकसभा चुनाव में हुआ ।
अब लौटते हैं अपने मूल विषय पर। 2017 के इस विधानसभा चुनाव में गुजरात में पड़े नोटा के मत गुजरात में NCP को मिले कुल मत से अधिक है। साथ ही भाजपा-कांग्रेस को छोड़ दें तो ये मत गुजरात में किसी भी अन्य दल के मत प्रतिशत से अधिक है। और उससे भी बड़ी बात की ये मत गुजरात की तकरीबन 25 सीटों को प्रभावित कर सकती थीं जहाँ नोटा का मत भाजपा या कांग्रेस के उम्मीदवारों के जीत के अंतर से कहीं अधिक है। और उसके बाद तो शायद गुजरात के जनादेश की तस्वीर ही कुछ और होती । इसके अतिरिक्त एक बात और ध्यान देने की ये है कि 2014 के गुजरात लोकसभा की अपेक्षा इस विधानसभा चुनाव में NOTA में लगभग 1.3 लाख मतों की अभिवृद्धि हुई है। इससे ये साफ हो जाता है कि जहाँ तत्कालीन भाजपा सरकार के प्रति लोगों में असन्तोष बढ़ा है वहीं कांग्रेस भी सत्ता विरोधी लहर का लाभ उठाने में नाकाम रही है। इसने जहाँ एक ओर ये स्पष्ट कर दिया है कि भारत की चुनावी व्यवस्था में खासतौर से राजनीतिक पार्टियों के प्रति जनता आशान्वित नहीं है तो दूसरी ओर जनता ने मतदान केंद्र पर जाकर इनको नकारने की हिम्मत दिखाई- ये बड़ी बात है। इसने जहाँ राजनीतिक पार्टियों को आइना दिखाया है वहीं लोकतन्त्र में भरोसा दिखाते हुए वोट डाल कर अपनी असहमत्यात्मक उपस्थिति दर्ज करायी है। पर हाँ ये भी सही है कि इस असहमति का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव सरकार बनने या ना बनने पर नहीं पड़ता है। पर ये प्रतीकात्मक असहमति राजनितिक दलों को सोचने पर मजबूर अवश्य करेगी, ऐसी हम आशा करते हैं। साथ ही NOTA के इस प्रतीकात्मक असहमति को और भी मजबूत करने की जरूरत है ताकि हमारा लोकतन्त्र और मजबूत हो सके।
कुल मिलाकर कहने का तातपर्य सिर्फ इतना है कि दोनों ही पार्टियाँ अपनी पीठ थपथपाने के साथ साथ इस दृष्टि से भी विचार करें कि इन लोगों के लिए उनका तथाकथित 'विकासवाद' और 'मानवतावाद' आखिर कहाँ चला गया..?? क्या वो इस व्यवस्था का हिस्सा नहीं? क्या उनके मत का कोई मूल्य नहीं? क्या ऐसा करने के पीछे उनकी कोई मजबूरी नहीं..??
गुजरात के जनादेश के कांग्रेस-बीजेपी जो भी मायने निकालते हों, निकालें। जिस भी दृष्टि से अपनी पीठ थपथपाना चाहते हों, थपथपालें! वे इसके लिए स्वतन्त्र हैं। पर इस जनादेश का एक पक्ष ऐसा भी है जिस पर इनका ध्यान नहीं जा रहा है! और जाये भी तो क्यों?? और वो है 'नोटा' (NOTA-None Of The Above) को मिले तकरीबन साढ़े पाँच लाख से अधिक वोट का । दरअसल NOTA विकल्प के अंतर्गत मतदाताओं को किसी भी उम्मीदवार को नापसन्द करने का अधिकार दिया गया है। इस विकल्प की व्यवस्था के लिए जनहित याचिकाओं के दबाव में सर्वप्रथम भारतीय निर्वाचन आयोग ने ही 2001 में सर्वोच्च न्यायालय में अपील की थी। जिस पर संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक लम्बी कालावधि के बाद 27 सितम्बर 2013 को EVM (Electronic Voting Machine) में NOTA विकल्प को स्थापित करने के आदेश दिए थे। जिसका प्रयोग सर्वप्रथम 2014 के लोकसभा चुनाव में हुआ ।
अब लौटते हैं अपने मूल विषय पर। 2017 के इस विधानसभा चुनाव में गुजरात में पड़े नोटा के मत गुजरात में NCP को मिले कुल मत से अधिक है। साथ ही भाजपा-कांग्रेस को छोड़ दें तो ये मत गुजरात में किसी भी अन्य दल के मत प्रतिशत से अधिक है। और उससे भी बड़ी बात की ये मत गुजरात की तकरीबन 25 सीटों को प्रभावित कर सकती थीं जहाँ नोटा का मत भाजपा या कांग्रेस के उम्मीदवारों के जीत के अंतर से कहीं अधिक है। और उसके बाद तो शायद गुजरात के जनादेश की तस्वीर ही कुछ और होती । इसके अतिरिक्त एक बात और ध्यान देने की ये है कि 2014 के गुजरात लोकसभा की अपेक्षा इस विधानसभा चुनाव में NOTA में लगभग 1.3 लाख मतों की अभिवृद्धि हुई है। इससे ये साफ हो जाता है कि जहाँ तत्कालीन भाजपा सरकार के प्रति लोगों में असन्तोष बढ़ा है वहीं कांग्रेस भी सत्ता विरोधी लहर का लाभ उठाने में नाकाम रही है। इसने जहाँ एक ओर ये स्पष्ट कर दिया है कि भारत की चुनावी व्यवस्था में खासतौर से राजनीतिक पार्टियों के प्रति जनता आशान्वित नहीं है तो दूसरी ओर जनता ने मतदान केंद्र पर जाकर इनको नकारने की हिम्मत दिखाई- ये बड़ी बात है। इसने जहाँ राजनीतिक पार्टियों को आइना दिखाया है वहीं लोकतन्त्र में भरोसा दिखाते हुए वोट डाल कर अपनी असहमत्यात्मक उपस्थिति दर्ज करायी है। पर हाँ ये भी सही है कि इस असहमति का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव सरकार बनने या ना बनने पर नहीं पड़ता है। पर ये प्रतीकात्मक असहमति राजनितिक दलों को सोचने पर मजबूर अवश्य करेगी, ऐसी हम आशा करते हैं। साथ ही NOTA के इस प्रतीकात्मक असहमति को और भी मजबूत करने की जरूरत है ताकि हमारा लोकतन्त्र और मजबूत हो सके।
कुल मिलाकर कहने का तातपर्य सिर्फ इतना है कि दोनों ही पार्टियाँ अपनी पीठ थपथपाने के साथ साथ इस दृष्टि से भी विचार करें कि इन लोगों के लिए उनका तथाकथित 'विकासवाद' और 'मानवतावाद' आखिर कहाँ चला गया..?? क्या वो इस व्यवस्था का हिस्सा नहीं? क्या उनके मत का कोई मूल्य नहीं? क्या ऐसा करने के पीछे उनकी कोई मजबूरी नहीं..??
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