वे ये नहीं जानते...-कविता
वे ये नहीँ जानते..
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उन्हें लगता है
थम गया हूँ
ऐसे
जैसे जम गया होऊँ
खिसकता तक नहीँ,
वक्त के साथ पेंच
और
और भी पेंच
कसते जा रहे हैं मुझमेँ,
कमीज़ में बटन की तरह
टाँक दिया गया हूँ
ताकि हिल न सकूँ
चल न सकूँ
बोल न सकूँ,
उन्हें गति स्वीकार नहीँ
वो ठहरे रहते हैं
और ठहरे ही रहना चाहते हैं
वे डरते हैं गति से,
पर वो नहीं जानते
वो मुझे थाम नहीँ सकते
रोक नहीँ सकते
बाँध बनाकर,
क्योंकि मैं विचारों से चलता हूँ,
भागता हूँ
और उड़ता हूँ
शरीर से नहीं,
वो शरीर को बाँध
मेरे विचारों को
और भी गतिशील बना जाते हैं
वे ये नहीँ जानते।।
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उन्हें लगता है
थम गया हूँ
ऐसे
जैसे जम गया होऊँ
खिसकता तक नहीँ,
वक्त के साथ पेंच
और
और भी पेंच
कसते जा रहे हैं मुझमेँ,
कमीज़ में बटन की तरह
टाँक दिया गया हूँ
ताकि हिल न सकूँ
चल न सकूँ
बोल न सकूँ,
उन्हें गति स्वीकार नहीँ
वो ठहरे रहते हैं
और ठहरे ही रहना चाहते हैं
वे डरते हैं गति से,
पर वो नहीं जानते
वो मुझे थाम नहीँ सकते
रोक नहीँ सकते
बाँध बनाकर,
क्योंकि मैं विचारों से चलता हूँ,
भागता हूँ
और उड़ता हूँ
शरीर से नहीं,
वो शरीर को बाँध
मेरे विचारों को
और भी गतिशील बना जाते हैं
वे ये नहीँ जानते।।
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