"लॉक-तन्त्र"-लेख

               दिल्ली विश्वविद्यालय में होने वाले छात्र-संघ चुनावों  का मैं पिछले 5 वर्षों से प्रत्यक्षदर्शी रहा हूँ। पहली बात तो ये कि ये चुनाव किसी भी एंगल से "छात्र"-संघ चुनाव नहीं लगता क्योंकि इनमें भाग लेने वाले उम्मीदवार और इनके साथ कम्पेन करने वाले लोग "छात्र" तो लगते ही नहीं, एक नजर भर में भाँप जायेंगे ज़नाब। कैसे भी कर कराके डीयू के किसी भी कॉलेज में या विश्वविद्यालय के बुद्धिज़्म डिपार्टमेंट में कोटा-सोटा लगाके, जुगाड़-पानी भिड़ा के दाखिला पा जाते हैं ये। इन्हें पढ़ने लिखने से तो दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। करते हैं तो फुल टाइम 'पॉलटिक्स'।
       
दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिल होने का इनका पहला और आखिरी मकसद यही होता है 'नेता' बनना। टिकट से मतलब अधिक होता है, पार्टी से कम और विचारधारा तो ऐसे भी पल्ले नहीं पड़ती इनके।  मम्मी-पापा लोग भी भरपूर सपोर्ट करते हैं। बल्कि अधिकांश के तो चाचा,मामा,ताऊ तो खुद ही नेता होते हैं और वो उन्ही से प्रेरणा पाकर यहाँ आते हैं, 'नेता' बनने।विश्वविद्यालयी आचार-संहिता का सरेआम हर साल उल्लंघन होता है और पुलिस वाले धर के ले भी जाते हैं तो आम छात्र को। नेता के बेटा-बेटियों को धरने की हिम्मत तो उन्हें होती नहीं। धर भी लिया तो थाने पहुँचने से पहले ही फोन आ जाता है और ऊपर से चाय-पानी पिलाना और पड़ जाता है।बड़ी बड़ी गाड़ियां मंगाई जाती हैं और उनसे कम्पेन करने के लिए पैसों पर,पार्टियों पर, बीयर पर,'लड़की' आदि पर बंदे मंगाए जाते हैं। चुनाव से एक महीने पहले से ही दिल्ली मेट्रो के पीलरों से लेकर सड़कों की दीवारों तक और दिल्ली विश्विद्यालय के विभिन्न कॉलेजों से लेकर नार्थ कैम्पस तक पर्चों से भर दिया जाता है। और इस बीच सबसे बड़ा और अहम काम होता है उम्मीदवारों को उठाने-बैठाने का। इन्ही के टीम के कुछ 'हॉकीधारी' लोगों के जिम्मे ये काम होता है, आप घर से,सड़क से कहीं से भी उठाये जा सकते हैं और लम्बे समय के लिए 'बैठाये' जा सकते हैं। विश्वविद्यालय के मुद्दे नहीं बैलेट नम्बर छात्रों को रटाये जाते हैं। बैलेट नम्बर का भी कुछ खास क्रम तैयार किया जाता है ताकि आसानी से उन्हें रटा और रटाया जा सके। इनके घोषणा पत्रों के वादे पिछले साल के घोषणा पत्रों से भावानुवाद और कॉपी-पेस्ट होते हैं। क्योंकि मुद्दे हर साल के वही होते हैं जो कभी पूरे नहीं होते। मिल मिलाकर वोटिंग 'शानदार' प्रतिशत के साथ होती है, जीतने वाले से अधिक वोट नोटा को पड़ता है। और इनसे जीते लोग लोकतन्त्र की दुहाई देते हैं। और जीते कोई भी इन्हीं जैसे लोग डूसू पैनल में पहुँचते हैं और फिर साल भर पार्टी और जश्न का माहौल रहता है। काम के नाम पर फ्रेशर-फेस्ट के अलावा कुछ नहीं होता। गाड़ियों के नेम प्लेट से लेकर पदाधिकारियों के कपड़े के क्रीच तक और गाड़ी की फ्रंट सीट पर बैठी 'ब्यूटी' की ब्यूटी तक किसी की भी ब्यूटी में सालों भर कोई कमी नहीं आती। हर रात हुक्का-दारू चलता है नई नई "मधुओं" और "मधुशालाओं" के साथ। कई बार विपक्षी पार्टी के लोग भी सारे 'गीले-शिकवे' भुला कर दारू-"हुक्के" मे शरीक़ होते हैं।
 
घर वालों का सपना पूरा हो जाता है। उनका बच्चा दिल्ली विश्वविद्यालय से 'लॉन्च' हो चुका रहता है। वो उसकी आगे की टिकटों की तैयारी में लग जाते हैं क्योंकि आगे चल कर देश भी तो इन्हें ही सम्भालना है। सत्ताधारी वर्ग ने जनता के विचारों, उसकी सोच को, उसकी एकता को बाँट दिया है, तोड़ कर कमज़ोर कर उन्हें कैद कर लिया है और उसे 'लॉक' कर चाभी अपने पास रख ली है। ये "लोकतन्त्र" नहीं "लॉकतन्त्र" है ज़नाब।।

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