कचरे के उसी ढेर से...-कविता
"कचरे के उसी ढेर से.."
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क्षण भर को जब भी
गुजरते हैं वहां से
सिकोड़ लेते हैं
आप अपनी नाक-भौहें,
घिना जाता है आपका मन
चित्त,
थूक पड़ते हैं
फच से
वहीँ पर,
उमसा जाते हैं और
भाग पड़ते हैं
सिर पर पाँव रखकर।
पर उनका क्या
जिनके परिवार
दशकों से
धूप-छाँव
सर्दी-गर्मी-बरसात
हाथ-नाक-मुँह
सब डालकर
ढूँढते रहे हैं
अपनी रोटियाँ
भरते रहे हैं
अपना पेट
कचरे के उसी ढेर से।
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क्षण भर को जब भी
गुजरते हैं वहां से
सिकोड़ लेते हैं
आप अपनी नाक-भौहें,
घिना जाता है आपका मन
चित्त,
थूक पड़ते हैं
फच से
वहीँ पर,
उमसा जाते हैं और
भाग पड़ते हैं
सिर पर पाँव रखकर।
पर उनका क्या
जिनके परिवार
दशकों से
धूप-छाँव
सर्दी-गर्मी-बरसात
हाथ-नाक-मुँह
सब डालकर
ढूँढते रहे हैं
अपनी रोटियाँ
भरते रहे हैं
अपना पेट
कचरे के उसी ढेर से।
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