ऐ मेरे मालिक...

ऐ मेरे मालिक..
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ऐ मेरे मालिक
रुक तो जा
जाना ही तो है,
और जाना तो है ही
चलता हूँ अभी
थोड़ी देर थम तो जा।
उठा लूँ चुन-चुनकर खुदको जरा
उन रस्तों से,
जहाँ उनके साथ
कहीं-कहीं कभी-कभी
मैं छूटा था,
मना तो लूँ गिर-गिर के
पैर पड़-पड़ के जरा
उन यादों में उनको
जहाँ कहीं-कहीं कभी-कभी
वो रूठा था..!!

Comments

  1. Sundar Bhupesh ...

    Chhute huye logo ko or rishto ko tab he ham paa sakte hai jab ham swam thoda jhukte hai...

    Bahut khub likha hai...

    Aise he likhte raho apne bhavo ko...

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